जयपाल जुलियस हन्ना साहित्य अवार्ड 2025 से पुरस्कृत आदिवासी साहित्यकार

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काशराय कुदादा

Description जमशेदपुर (झारखंड) के निवासी काशराय कुदादा ‘हो’ आदिवासी समुदाय के जाने-माने अधिकार कार्यकर्ता, लेखक, संपादक और संस्कृतिकर्मी हैं। “दुपुब दिषुम” उनका नवीनतम निबंध-संग्रह है, जिसे उन्होंने अपनी मातृभाषा ‘हो’ और वाराङक्षिति लिपि में लिखा है। ‘हो’ भाषा आग्नेय भाषा परिवार के मुंडा समूह से संबंधित है। 1940 के दशक में भाषाविद् और सांस्कृतिक पुरोधा लको बोदरा ने ‘हो’ भाषा के लिए वाराङक्षिति लिपि का निर्माण किया। इसके बाद झारखंड में संताली समुदाय की तरह ‘हो’ भाषियों ने भी अपनी लिपि में लेखन और प्रकाशन का संगठित अभियान शुरू किया।

आदिवासी साहित्य में भाषा और लिपि का प्रश्न लंबे समय से केंद्रीय बहस का विषय रहा है। किसी भाषा की समृद्धि केवल इस बात से तय नहीं होती कि उसकी अपनी लिपि है या नहीं। लिपिविहीन भाषा भी स्मृति, ध्वनि, गीत, कथा और सामुदायिक परंपरा में अत्यंत समृद्ध हो सकती है। फिर भी, जब व्याकरण और लिपि बाहर से थोपी हुई व्यवस्था बन जाएँ, तो वे भाषा की स्वाभाविक ध्वन्यात्मकता और अभिव्यक्ति को सीमित कर सकती हैं। आदिवासी जीवन-दृष्टि हमें बताती है कि भीतर से विकसित अनुशासन ‘स्वशासन’ है, जबकि बाहर से थोपा गया अनुशासन ‘अतिक्रमण’ बन जाता है। काशराय कुदादा ‘हो’ भाषा और साहित्य के संरक्षण, संवर्धन और प्रसार के लिए लंबे समय से सक्रिय हैं। उन्होंने पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन किया, भाषा-प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए, युवाओं में सांस्कृतिक चेतना विकसित की और सॉफ्टवेयर व मोबाइल ऐप जैसे तकनीकी माध्यमों से ‘हो’ भाषा को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का काम किया। “दुपुब दिषुम” न केवल उनके वैचारिक और सांस्कृतिक सरोकारों का दस्तावेज है, बल्कि ‘हो’ भाषा-साहित्य की आधुनिक यात्रा में भी एक महत्त्वपूर्ण योगदान सिद्ध होगा। यही संग्रह की विशिष्ट शक्ति है।

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सोनी रूमछु

Description सोनी रूमछु ‘ओलो’ अर्थात ‘नोक्ते’ समुदाय से आते हैं, जिसका इतिहास विशिष्ट सांस्कृतिक और सामाजिक अनुभवों से समृद्ध है। एक कम चर्चित तथ्य यह भी है कि अंग्रेजों को चाय के स्थानीय ज्ञान से परिचित कराने में नोक्ते समुदाय की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। इसी ज्ञान ने औपनिवेशिक काल में चाय की खेती और व्यापार के विस्तार का मार्ग प्रशस्त किया। इस इतिहास में संघर्ष, प्रतिरोध और अनेक अनकहे प्रसंग भी शामिल हैं, जिन्हें मुख्यधारा के इतिहास ने पर्याप्त स्थान नहीं दिया।

यह भी उल्लेखनीय है कि आदिवासी अभिव्यक्ति की जड़ें मौखिक परंपरा में गहराई से जुड़ी हैं। लिखित शब्द इस संसार में अक्सर बाहरी सांस्कृतिक व्यवस्था के हस्तक्षेप की तरह उपस्थित हुआ है। अरुणाचल प्रदेश इसका महत्त्वपूर्ण उदाहरण है, जहाँ अनेक आदिवासी भाषाओं की जीवंत उपस्थिति के बावजूद हिंदी का प्रभाव व्यापक है। यह स्थिति भाषा, पहचान और सत्ता के जटिल संबंधों को समझने का अवसर देती है। ‘वह केवल पेड़ नहीं था’ एक युवा नोक्ते मन की संवेदनाओं, स्मृतियों, अनुभवों और दृष्टि की सशक्त अभिव्यक्ति है। यह संग्रह भले ही मुख्यधारा की हिंदी कविता के औपचारिक मानदंडों से अलग दिखाई दे, पर इसकी वास्तविक शक्ति आदिवासी अनुभव की स्वाभाविकता और आत्मीयता में निहित है। कहीं-कहीं हिंदी की संरचना भावों की पूरी तीव्रता को वहन नहीं कर पाती, फिर भी रचनाओं का कथ्य भाषा की सीमाओं को पार कर जाता है। इन कविताओं को पढ़ते हुए पाठक केवल शब्द नहीं, बल्कि एक युवा आदिवासी आत्मा की धड़कन सुनता है। विश्वास है कि सोनी रूमछु की यह काव्य-यात्रा अरुणाचल ही नहीं, भारतीय साहित्य को भी नई संवेदना, ऊर्जा और दृष्टि प्रदान करेगी। यह संग्रह संवाद के नए रास्ते भी खोलता है। उन्हें हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ।

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मनोज मुर्मू

Description झारखंड के साहेबगंज निवासी मनोज मुर्मू संताली भाषा के युवा कवि हैं और ‘मानवा जीयोन’ उनका पहला कविता-संग्रह है। जब सोशल मीडिया युवा सृजनशीलता को इमोजी प्रतिक्रियाओं और कुछ शब्दों की अभिव्यक्ति तक सीमित कर रहा है, मनोज की कविताएँ उम्मीद जगाती हैं। वे प्रमाण हैं कि आदिवासी युवाओं में अपनी भाषा, संस्कृति और सामुदायिक स्मृतियों के प्रति गहरा लगाव जीवित है। ‘मानवा जीयोन’ संताली भाषा में, देवनागरी लिपि में प्रकाशित है। संताल भारत के प्रमुख आदिवासी समुदायों में हैं। संताली संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल है और इसका समृद्ध लिखित साहित्य देवनागरी, रोमन, बांग्ला, असमिया तथा ओलचिकी सहित अनेक लिपियों में विकसित हुआ है।

1940 के दशक में रघुनाथ मुर्मू द्वारा निर्मित ओलचिकी ने संताली लेखन को नई पहचान दी, जबकि झारखंड के संताली लेखक सामाजिक और सांस्कृतिक कारणों से देवनागरी तथा रोमन में भी लिखते रहे हैं। आदिवासी भाषा-साहित्य के विमर्श में लिपि का प्रश्न बार-बार सामने आता है। यह बहस तब जटिल हो जाती है, जब लिपि को धर्म, अस्मिता या सांप्रदायिक आग्रह से जोड़ दिया जाता है। किसी भाषा की समृद्धि केवल उसकी लिपि से निर्धारित नहीं होती; उसकी वास्तविक शक्ति स्मृति, ध्वनि, गीत, कथा, अनुभव और सामुदायिक ज्ञान में निहित होती है। आदिवासी दृष्टि हमें सिखाती है कि भीतर से विकसित अनुशासन स्वशासन है, जबकि बाहर से थोपा गया अनुशासन अतिक्रमण बन सकता है। इस प्रेरक काव्य-सृजन के लिए मनोज मुर्मू को हार्दिक बधाई। साथ ही झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा, प्यारा केरकेट्टा फाउंडेशन, टाटा स्टील फाउंडेशन, ‘जयपाल-जुलियुस-हन्ना साहित्य पुरस्कार’ 2025 चयन समिति और संयोजक डॉ. प्रीति रंजना डुंगडुंग के प्रति हार्दिक आभार, जिनके सहयोग से यह सम्मान व्यापक साहित्यिक फलक पर संभव हुआ।

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इन तीनों लेखकों की रचनाएँ भारतीय आदिवासी जीवन, संघर्ष, और उनकी सांस्कृतिक धरोहर को प्रकाश में लाती हैं। इनकी कृतियाँ न केवल साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि आदिवासी समाज के अस्मिता और उनके संघर्षों को भी सही तरीके से प्रस्तुत करती हैं।

हम हैं – धरती के संरक्षक, स्थिरता के रचनाकार.

आदिवासी साहित्यिक जगत में बीस से अधिक वर्षों का अनुभव